- Format
- Bog, paperback
- Hindi
- 176 sider
Normalpris
Medlemspris
- Du sparer kr. 15,00
- Fri fragt
-
Leveringstid: 7-12 Hverdage (Sendes fra fjernlager) Forventet levering: 09-03-2026
- Kan pakkes ind og sendes som gave
Beskrivelse
गीतांजलि श्री के लेखन में अमूमन, और 'तिरोहित' में ख़ास तौर से, सब कुछ ऐसे अप्रकट ढंग से घटता है कि पाठक ठहर-से जाते हैं। जो कुछ मार्के का है, जीवन को बदल देनेवाला है, उपन्यास के फ्रेम के बाहर होता है। ज़िन्दगियाँ चलती-बदलती हैं, नए-नए राग-द्वेष उभरते हैं, प्रतिदान और प्रतिशोध होते हैं, पर चुपके-चुपके। व्यक्त से अधिक मुखर होता है अनकहा। घटनाक्रम के बजाय केन्द्र में रहती हैं चरित्र-चित्रण व पात्रों के आपसी रिश्तों की बारीकियाँ। पैनी तराशी हुई गद्य शैली, विलक्षण बिम्बसृष्टि और दो चरित्रों-ललना और भतीजा-के परस्पर टकराते स्मृति प्रवाह के सहारे उद्घाटित होते हैं 'तिरोहित' के पात्र उनकी मनोगत इच्छाएँ, वासनाएँ व जीवन से किए गए किन्तु रीते रह गए उनके दावे। अन्दर-बाहर की अदला-बदली को चरितार्थ करती यहाँ तिरती रहती है एक रहस्यमयी छत। मुहल्ले के तमाम घरों को जोड़ती यह विशाल खुली सार्वजनिक जगह बार-बार भर जाती है चच्चो और ललना के अन्तर्मन के घेरों से। इसी से बनता है कथानक का रूप। जो हमें दिखाता है चच्चो/बहन जी और ललना की इच्छाओं और उनके जीवन की परिस्थितियों के बीच की न पट सकनेवाली दूरी। वैसी ही दूरी रहती है इन स्त्रियों के स्वयं भोगे यथार्थ और सम
Detaljer
- SprogHindi
- Sidetal176
- Udgivelsesdato01-01-2007
- ISBN139788126713622
- Forlag Rajkamal Prakashan
- FormatPaperback
- Udgave0
Størrelse og vægt
10 cm
Anmeldelser
Vær den første!